।। जिन्दगी ।।

।। जिन्दगी ।।

दुःख-दर्द,हर्ष-शोक,मान-अपमान,
यश-अपयश ,ये सब चीज़ें जिन्दगी में लगी रहती हैं । इनसे गुज़रकर हमें अपनी कीर्ति स्थापित करनी होती है । ख्याति ऐसे ही नहीं मिलती उसके लिए खुद को साधना होता है, तपस्या करनी होती है तथा धैर्यवान होना पड़ता है ।
तो प्रस्तुत है,मेरी ये कविता……

जिन्दगी सिखाती है,जीना ।
जिन्दगी ही सिखाती है,रोना ।
जिन्दगी सिखाती है,हर गम भुलाना ।
तो जिंदगी ही सिखाती है,
हर दर्द पर मरहम लगाना ।।

तकलीफ तो होती है !
मगर उसका क्या ??
जिसने तकलीफ झेलना ही न जाना ।
भला वो क्या जश्न मनाएगा !
अपनी जीत का ,
जिसने कभी गिरकर उठना ही न जाना ।।

जिसने जिन्दगी में कुछ किया है ,
निश्चित ही उसने अपमान के लहू को पीया है ।
जिसके जीवन में कोई कठिनाई न आई ,
इतिहास में उसकी कोई कहानी न बन पाई ।।

गिरकर उठना ,उठकर गिरना ;
यही जिन्दगी का दस्तूर है ।
पाकर खोना ,खोकर पाना ;
यही हमारे जिन्दगी का फितूर है ।।

हार का स्वाद ही ,
जीत के स्वाद की प्यास जगाता है ।
और अंततः मानव को ,
उसे उसकी मंजिल से मिलाता है ।।

Suraj Kumar Jha

मेरा नाम सूरज कुमार झा है । अभी मैं एक इंजीनियरिंग स्टूडेंट हूँ । अपने पाठ्यक्रम के अतिरिक्त मुझे हिन्दी और हिन्दी साहित्य में बहुत रुझान है और मुझे कविता, शेर, ग़ज़ल नज़्म इत्यादि लिखना तथा पढ़ना बेहद पसंद है ।

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